हिन्दी काव्यशास्त्र छन्द : परिभाषा, भेद, उदहारण I प्रतियोगी परीक्षा UGC NET,PGT ..........
प्रमुख प्रमुख मात्रिक छन्द
1. दोहा :- दोहा वह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है जिसके प्रथम व तृतीय चरण में तेरह-तेरह और द्वितीय तथा चतुर्थ चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती है और सम चरणों के अंत में गुरु-लघु होता है.2. सोरठा :- यह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है. यह दोहे का उल्टा है अर्थात इसके प्रथम तथा तृतीय चरण में 11-11 और द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं.3. रोला :- यह सममात्रिक छन्द है. इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं और प्रत्येक चरण में 11 और 13 मात्राओं पर यति होता है. प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरु या दो लघु की योजना रहती है.4. चौपाई :- यह सममात्रिकछन्द है. इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ हैं और अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं तथा अंत में जगण और तगण का आना वर्जित है.5. बरवै :- यह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है. इसके विषम चरणों (प्रथम व तृतीय) में 12-12 मात्राएँ और समचरणों (दूसरे और चौथे) में 7-7 मात्राएँ होती हैं, और इसके समचरणों के अंत में प्राय: जगण या तगण पड़ता है.6. छप्पय :- छप्पय वह विषम मात्रिक छन्द है, जो दो छंदों – रोला तथा और उल्लाला के मिश्रण से बनता है. इसमें छः चरण होते हैं और प्रथम चार चरणों 24-24 मात्राएँ और अंतिम दो चरणों में 26-26 या 28-28 मात्राएँ होती हैं.7. कुंडलिया :- कुंडलिया वह विषम मात्रिक छन्द है, जो दो छंदों – दोहा और रोला के मिश्रण से बनता है, जिसमें छह चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं और दोहे का चरण रोला के प्रथम दोहराया जाता है.प्रमुख वर्णिक छन्द8. इन्द्रवज्रा :- इंद्रवज्रा वह वर्णिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते है, जो इस क्रम में रखे जाते हैं – दो तगण, एक जगण और अंत में दो गुरो वर्ण9. द्रुत विलम्बित :- द्रुतविलम्बित वह वर्णिक छन्द है, जिसके चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं, जो एक नगण, दो भगण औरएक रगण के क्रम से रहते हैं.10. मंदक्रांता :- मंदाक्रान्ता वह वर्णिक छन्द है, जिसके चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं, जो एक मगण, एक भगण, एक नगण, दो तगण और अंत में दो गुरु के क्रम से रखे रहते हैं.11. मालिनी :- मालिनी वह वर्णिक छन्द है, जिसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 15 वर्ण होते हैं, जो दो नगण, एक मगण तथा दो यगण के क्रम से रखे गये रहते हैं और आठ तथा सात अक्षरों पर यति होती है.12. शिखरिणी :- शिखरिणी वह वर्णिक छन्द है, जिसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं, जो एक यगण, एक मगण, एक नगण, एक सगण, एक भगण, एक लघु और एक गुरु के क्रम से रखे गये रहते हैं और छह और ग्यारह वर्णों पर यति होती है.13. सवैया :- सवैया वह वर्णिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्ण होते हैं और प्रत्येक चरण किसी एक गण की सात-आठ आवृत्ति से बना होता हो.14. मत्तगयंद :- मत्तगयंद वह सवैया है जिसके प्रत्येक चरण में 23 अक्षर होते हैं, जो सात भगण और दो गुरु के क्रम से रखे गए रहते हैं.15. कवित्त :- कवित्त वह वर्णिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 31-31 या 32-32 या 33-33 वर्णरहते हैं. इसमें मात्राओ के क्रम का नियंत्रण होने से गणों का विधान नहीं है; केवल वर्णों की संख्या प्रत्येक चरण में बराबर होती है.इसके तीन भेद होते हैं, जो निम्न है :-
क. मनहरण कवित्त :- इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं. प्रत्येक सोलह वर्णों परयति होता है. अंत में गुरु होता है.
ख.रूपघनाक्षरी :- इसके प्रत्येक चरण में 32 वर्ण होते हैं.प्रत्येक सोलह वर्णों पर यति होता है. अंत में लघु होता है.
ग. देवघनाक्षरी :- इसके प्रत्येक चरण में 33 वर्ण होते हैं. प्रत्येक आठवें वर्ण पर विराम होता है. अंतिम तीन वर्ण लघु होते हैं.
1. दोहा :- दोहा वह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है जिसके प्रथम व तृतीय चरण में तेरह-तेरह और द्वितीय तथा चतुर्थ चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती है और सम चरणों के अंत में गुरु-लघु होता है.
2. सोरठा :- यह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है. यह दोहे का उल्टा है अर्थात इसके प्रथम तथा तृतीय चरण में 11-11 और द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं.
3. रोला :- यह सममात्रिक छन्द है. इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं और प्रत्येक चरण में 11 और 13 मात्राओं पर यति होता है. प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरु या दो लघु की योजना रहती है.
4. चौपाई :- यह सममात्रिकछन्द है. इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ हैं और अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं तथा अंत में जगण और तगण का आना वर्जित है.
5. बरवै :- यह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है. इसके विषम चरणों (प्रथम व तृतीय) में 12-12 मात्राएँ और समचरणों (दूसरे और चौथे) में 7-7 मात्राएँ होती हैं, और इसके समचरणों के अंत में प्राय: जगण या तगण पड़ता है.
6. छप्पय :- छप्पय वह विषम मात्रिक छन्द है, जो दो छंदों – रोला तथा और उल्लाला के मिश्रण से बनता है. इसमें छः चरण होते हैं और प्रथम चार चरणों 24-24 मात्राएँ और अंतिम दो चरणों में 26-26 या 28-28 मात्राएँ होती हैं.
7. कुंडलिया :- कुंडलिया वह विषम मात्रिक छन्द है, जो दो छंदों – दोहा और रोला के मिश्रण से बनता है, जिसमें छह चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं और दोहे का चरण रोला के प्रथम दोहराया जाता है.
प्रमुख वर्णिक छन्द
8. इन्द्रवज्रा :- इंद्रवज्रा वह वर्णिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते है, जो इस क्रम में रखे जाते हैं – दो तगण, एक जगण और अंत में दो गुरो वर्ण
9. द्रुत विलम्बित :- द्रुतविलम्बित वह वर्णिक छन्द है, जिसके चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं, जो एक नगण, दो भगण औरएक रगण के क्रम से रहते हैं.
10. मंदक्रांता :- मंदाक्रान्ता वह वर्णिक छन्द है, जिसके चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं, जो एक मगण, एक भगण, एक नगण, दो तगण और अंत में दो गुरु के क्रम से रखे रहते हैं.
11. मालिनी :- मालिनी वह वर्णिक छन्द है, जिसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 15 वर्ण होते हैं, जो दो नगण, एक मगण तथा दो यगण के क्रम से रखे गये रहते हैं और आठ तथा सात अक्षरों पर यति होती है.
12. शिखरिणी :- शिखरिणी वह वर्णिक छन्द है, जिसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं, जो एक यगण, एक मगण, एक नगण, एक सगण, एक भगण, एक लघु और एक गुरु के क्रम से रखे गये रहते हैं और छह और ग्यारह वर्णों पर यति होती है.
13. सवैया :- सवैया वह वर्णिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 वर्ण होते हैं और प्रत्येक चरण किसी एक गण की सात-आठ आवृत्ति से बना होता हो.
14. मत्तगयंद :- मत्तगयंद वह सवैया है जिसके प्रत्येक चरण में 23 अक्षर होते हैं, जो सात भगण और दो गुरु के क्रम से रखे गए रहते हैं.
15. कवित्त :- कवित्त वह वर्णिक छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 31-31 या 32-32 या 33-33 वर्णरहते हैं. इसमें मात्राओ के क्रम का नियंत्रण होने से गणों का विधान नहीं है; केवल वर्णों की संख्या प्रत्येक चरण में बराबर होती है.इसके तीन भेद होते हैं, जो निम्न है :-
क. मनहरण कवित्त :- इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं. प्रत्येक सोलह वर्णों परयति होता है. अंत में गुरु होता है.
ख.रूपघनाक्षरी :- इसके प्रत्येक चरण में 32 वर्ण होते हैं.प्रत्येक सोलह वर्णों पर यति होता है. अंत में लघु होता है.
ग. देवघनाक्षरी :- इसके प्रत्येक चरण में 33 वर्ण होते हैं. प्रत्येक आठवें वर्ण पर विराम होता है. अंतिम तीन वर्ण लघु होते हैं.
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