2019 में हिन्दी कविता की जगह कम नहीं हुई II पूरे साल की एक समीक्षा जो एक नई जानकारी

2019 में हिन्दी कविता की जगह कम नहीं हुई II पूरे साल की एक समीक्षा
कविता ने सदैव समाज को एक राह दिखाई है. इसी में जीवन के सुभाषित छिपे होते हैं और सत्ता को चुनौती देने वाली निर्भीकता भी साल 2019 के कविता संसार में समाया है वरिष्ठ पीढ़ी और नई पीढ़ी का काव्यात्मक मर्म क्या है? आइए प्रकाश डालते हैं....... 
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हिन्दी कविता संग्रह


आज हर ओर कविता का उत्कट प्रवाह देखने को मिलता है. इस बात की चिंता किए बगैर कि वह कविता की कसौटी पर इसे जाने योग्य है भी नहीं. सोशल माध्यम, इन्टरनेट, फेसबुक व ट्विटर आदि ने इसमें उत्प्रेरक की भूमिका अदा की है. साल 2019 के कविता संसार को देखने पर यही पता चलता है कि बड़े प्रकाशकों से लेकर छोटे-छोटे प्रकाशकों के यहाँ से कोई पाँच सौ कविता संग्रह इस साल प्रकाशित हुए हैं. इनमें कितने काल प्रवाह में बह जाएँगे, कितने टिकेंगे, कह पाना मुश्किल है.

कविता के वरिष्ठ नागरिक :

हर साल यह जानने की आकांक्षा रहती है कि वरिष्ठ पीढ़ी क्या कुछ लिख रही है. इस लिहाज से साल की शुरुआत अशोक वाजपेयी के संग्रह ‘कम से कम’ से हुई. अपने सुपरिचित अंदाज में रची कविताएँ उन्हें कविता के विपक्ष की भूमिका में प्रतिष्ठित करती हैं. विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पित अरुण कमल का संग्रह ‘योगफल’ उनके कवित्व का श्रेष्ठ उदाहरण बनकर आया और उन्होंने यह सिद्ध किया कि साठोत्तर वय उम्र में भी उनमें कविता से सत्व उगाहने की ऊर्जा भरपूर है. अनामिका का संग्रह ‘पानी को सब याद था’ उनकी अब तक की आजमायी कविता की प्रकृति प्राविधि का अनन्य उदहारण है. हेमन्त शेष की कवितों के लिए यह साल एक उर्वर वर्ष रहा. उनके दो-तीन संग्रह एक साथ आए. प्रेम कविताओं का चयन ‘इति जैसा शब्द’ और तीन संग्रहों को समवेत चयन ‘न होने जैसा होना’ भी. कविता में अलग ढंग और ढब के कवि ज्ञानेद्रपति वर्तमान और समकाल के सबसे सक्रिय कवियों में हैं, जिनकी हर कविता किसी लिखे जा रहे सतत महाकाव्य का अंश लगती है. ‘गंगा-बीती गंगू तेली की जुबानी’ पढ़ते हुए लगता है गांगेय संस्कृति सभ्यता को पूरी तौर पर अभी कवि ने खंगाला नहीं, इसलिए ‘गंगातट’ के वर्षों बाद भी गंगा को लेकर उनकी कवि कल्पना अप्रतिहत और अबाध है. वाणी प्रकाशन ने केदारनाथ सिंह के संग्रहों से चुनिन्दा छोटी कविताओं का संग्रह ‘आँसू का वजन’ प्रकाशित कर जैसे कवि को कृतज्ञता ज्ञापित की.
अरसे बाद विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का संग्रह ‘सबने कुछ दिया’ आया है. मुकुन्द लाठ ने संस्कृत मुक्तकों का काव्यानुवाद ‘गगनवट’ नाम से प्रस्तुत किया तो संस्कृत का कुछ और खजाना हिन्दी को उपलब्ध हुआ. गंगाप्रसाद विमल का संग्रह ‘कहीं से भी देखो’ उनके कविता के स्थापत्य के प्रति आकृष्ट करता है. अन्य ध्यातव्य संग्रहों में नरेन्द्र मोहन का ‘जितना बचा है मेरा होना’, भगवान स्वरूप कटियार का ‘समय का चेहरा’, अंजना टंडन का ‘कैवल्य’ और कुमार कृष्ण का ‘पक्षी की चोंच के दाने में उड़ रहा है गाँव’ और ‘उम्मीद का पड़े’ अपने समकालीन कव्यबोध से आश्वस्त करते हैं. अमन प्रकाशन ने इस वर्ष ‘वरिष्ठ कवि रामदरश मिश्र कविता समग्र’ प्रकाशित किया तो वरिष्ठ कवि विश्वनाथ सचदेव का संग्रह ‘बुढ़िया सूत और सपने’ और राजकुमार कुंभज का ‘अन्धो में अदृश्य जो भी’ प्रभात प्रकाशन ने लीक से हटकर ‘गोपाल दास नीरज की हस्तलिखित कविताएँ’ प्रज्ञा शर्मा के संपादन में छापीं जो कि धरोहर के तुल्य है. मायामृग की भीने-भीने अध्यात्म भाव का सा खुद देने वाली कविताएँ ‘मुझमें मीठा तू है’ शीर्षक से आई तो अरसे से काव्यरत सुधीर मोता का संग्रह ‘भाषाओँ के समुद्र में’ नाम से. ‘देस की कविताएँ’ विनोद पदरज को हिन्दी के एक समर्थ कविता के रूप में चिन्हित करती है. ‘तुमड़ी के शब्द’ के जरिए बद्रीनारायण ने कविता में फिर एक मजूबतदस्तक दी हैं. दिवगंत कवियित्री स्नेहमयी चौधरी का संग्रह ‘अरे अब और नहीं’ भी हाल ही में आया है. उपेन्द्र कुमार ने ‘वायुपुरुष’ लिखकर अपनी प्रबंधात्मकता का पुन: परिचय दिया है.


कविता में आधुनिकी के हामी अष्टभुजा शुक्ल तो वैसे ही रस की खान हैं, किन्तु ‘रस की लाठी’  कविता संग्रह से वह कविता चर्चा की सतह पर अपनी जबर्दस्त आमद बनाए हुए हैं. साल का जाल सिमटते-सिमटते उदय प्रकाश के संग्रह ‘अबंर में अबाबील’ ने जहाँ एक तरह से आजतक साहित्य उत्सव में सुर्खिया बटोरी, वहीं अपने समकालीन के समक्ष फिर अपनी कविताओं से एक नया मील का पत्थर गढ़ा. कविताओं से एक नया मील का पत्थर गढ़ा. पटना के वरिष्ठ कवियों में जाबिर हुसेन के कई संग्रहों के बीच ‘ओक में बुँदे’ उनके सामाजिक सरोकारों की बानगी देने वाला संग्रह है तो वहीँ के विनय कुमार का काव्य ‘यक्षिणी’ कविता में कला का निरूपण है. कविता में अनवरत सक्रिय मदन कश्यप का ‘पनसोखा है इन्द्रधनुष’ और शाहंशाह आलम का संग्रह ‘थिरक रहा देह का पानी’ भी चर्चा में रहा. लंबे अरसे से चुप वरिष्ठ कवि गिरधर राठी का संग्रह ‘नाम नहीं’ रजा फाउडेशन से आया. सेतु प्रकाशन ने प्रकाशन को चुनौती के रूप में लेते हुए सेतु समग्र के अंतर्गत विष्णु खरे  और अशोक वाजपेयी की समग्र कविताएँ छापीं. राकेश मिश्र के तीन संग्रह : ‘चलते रहे रात भर’,  जिन्दगी एक कण हैं’ और ‘अटक गई नींद’ एक साथ प्रकाशित हुए. संगीता गुप्ता का संग्रह ‘बीज सिर्फ जमीन पर नहीं उगते हैं’ उनकी कलात्मक संवेदना का अचूक उदाहरण है तो वसंत सकरगाए का संग्रह ‘पखेरू जानते हैं’ यथार्थवादी कविताओं का समावेशी है. यथार्थवादी कविताओं का समावेशी संग्रह है. संपादित संग्रहों में सबसे अधिक चर्चा कुमार, अनुपम द्वारा संपादित और विजया बुक्स से प्रकाशित ‘प्रेम पिता की दिखाई नहीं देता’ संपादित संग्रहों में सबसे  अधिक चर्चा कुमार अनुपम द्वारा संपादित और विजया बुक्स से प्रकाशित ‘प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता’ संग्रह ने बटोरी. लोकोदय से प्रकाशित शहंशाह आलम का संग्रह ‘आग मुझमें कहाँ नहीं पाई जातीं’ की कविताएँ प्रगितशील सोच को दिशा देती हैं.

गीत गजल और अन्य छन्द विधाएँ :

नई कविता के वर्चस्व ने कविता की अन्य शैलियों को जैसे महत्त्वहीन बना दिया है, जबकि पहले कविता में इतनी फांक न थी. धीरे-धीरे पुन: कविता में छंदों का पुनर्वास हो रहा है. कभी द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जैसे कवि ने कहा था, जो गाया नहीं गया है वह भुला दिया गया है. गीत की लंबी साधना में रमे जमे यश मालवीय का संग्रह ‘काशी नहीं जुलाहें की’ उनकी सुपरिचित वाचिक अदायगी का प्रमाण है. नवगीत के पुरोधा अनूप अशेष का संग्रह ‘सपने मरने के लिए आते हैं नींद में’ ऐसे ही यथार्थवादी समय से टकराते हुए गीतों का संग्रह है जहाँ वे दुबले होते दिनों की व्यंजना इस तरह करते हैं, ‘बछड़े के मुंह में सूखे थन/ जैसे अपने दिन’. नवगीत के अन्य संग्रहों में रविशंकर मिश्र का संग्रह ‘सन्दर्भों से कट कर’ के अच्छा संग्रह ‘सदर्भों से काट कर’ एक अच्छा संग्रह बन पड़ा है. सोनरूपा विशाल का संग्रह ‘पिछले बरस का गुलमोहर’ अपनी भीतर पारंपरिक गीत के अस्वाद को बचाए हुए है. कुमार विश्वास के गीत ‘फिर उनको याद’ शीर्षक से आए तो योगेन्द्र प्रसाद मौर्य का संग्रह ‘चुप्पियों को तोड़ते हैं’, ओम प्रकाश तिवारी का नवगीत संग्रह ‘माफ़ करना कौस्ताम्भ’, विनय भदौरिया का नवगीत संग्रह ‘अन्तराएं बोलती है’ आज के समय से जुड़ते हैं. दोहा विधा में भी प्रकाशित कुमार शिव को ‘छंद सुनता समुंदर’, उदय करण सुमन का ‘सुख की धूप’ और जय चक्रवर्ती का ‘जिन्दा हैं आँखों अभी’ इस लुप्त होती विधा को जीवन देते हैं.
गजलों की दुनिया इन दिनों ज्यादा गुलजार है. जिसे देखो गजल लिख रहा है. पाकिस्तान से हमारे तनावपूर्ण संबंध भले हो, शायरी ने ये सरहदें तोड़ी हैं. राज्यपाल एण्ड संज ने शायरी का विस्तार करते हुए ‘सात पाकिस्तानी शायर’ ‘सरहद के आरपार की शायरी’ जैसे खुबसूरत चयन छापे तो सुदर्शन फाकिर की शायरी ‘कागज की कश्ती’व इकबाल अशहर की गजलों नज्मों की पुस्तक ‘उर्दू है मेरा नाम’ का प्रकाशन भी किया युवा शायर वेदमित्र शुक्ल का भी एक संग्रह इसी साल आया है तो चुनिन्दा गजल सीरिज में रामदरश मिश्र की गजलें भी ‘बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे’ जैसे ख्यात शीर्षक से आई है.

आदिवासी एवं दलित कविता :

पिछले दो दशकों से आदिवासी और दलित कविता चर्चा के केन्द्र में है. पिछले साल श्योराज सिंह ने आगाज किया था तो इस साल उनका संग्रह ‘भोर के अँधेरे में’ आया है. इसी तरह दलित कविता के प्रखर स्वर असंगघोष का संग्रह ‘बंजर धरती के बीच’ आया है. दलित विमर्श को केन्द्र में स्थापित करने में दलित आत्मकथाओं की जैसी भूमिका रही है, वैसी भूमिका कविताओं की नहीं बन सकी. आदिवासी कवि अपनी अभिव्यक्ति में बहुत पैने और प्रखर हैं. विरोध और प्रतिपक्ष की आवाज उनमें सघन काव्यसंवेदना बनकर उभरी है. कुछ साल पहले रमणिका गुप्त ने ‘कलम को तीर होने दो’ शीर्षक से कुछ आदिवासी कवियों को संकलित किया था. इस काम को आगे बढ़ाया है कवियित्री वंदना टेटे ने उनके द्वारा संपादित ‘कवि मन जनी मन’ में सुषमा असुर, रोज केरकेट्टा, ग्रेसर कुजूर, फ्रांसिस्का कुजूर, उज्ज्वल ज्योति तिग्ग’ दमयंती सिंकू, शान्ति खलखो, यशोदा मुर्मू, ज्योति लकड़ा, जसिंता केरकेट्टा का एकल संग्रह ‘जड़ो की जमीन’ बहुत से समयुवा कवियों पर भारी पड़ता है. निर्मला पुतुल और अन्ना माधुरी तिर्की की पीढ़ी से अब तक के अनेक युवा कवि आदिवासी कविताओं के जरिए ऐसे सवाल उठा रहे हैं जो अभी तक अलक्षित रहे हैं.


इसी तरह कविता बाजार के तमाम संकटों के बावजूद इसीलिएसबसे ज्यादा छप रही है कि उसमें कही गई बात दिल को जल्दी छू लेती है. वे लोकगीत हों, ग्राम्यगीत हो, कविताएँ हों, गीत-नवगीत हों या गजलें..... आज भी इनके करोड़ों पाठक-श्रोता मौजूद हैं.

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