क्या आप जानते हैं? नये हिन्दी लेखक की तीखी आलोचना पोशाक को लेकर II लिखना है तो दिखना भी है
लिखना है तो दिखना भी है
लॉकडाउन में वक्त काटने के बहुत बड़ा सहारा बनी किताबें. वहीँ लाइन
रीडिंग और इंटरैक्शन के जरिए लेखकों ने पाठकों को अपने साथ जोड़कर भी रखा. वाकई
तकनीक के साथ बदलते ने लेखकों की छवि उनका मन रमता है अपने अंदाज में दिखने का भी
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| हिन्दी लेखक और उनका पोशाक |
अपना एक कमरा, पढ़ने की किताबें और लिखने के लिए
कागजों का पुलिंदा और कॉपी, इन्ही के बीच गुजर जाता था एक लेखक का जीवन. साहित्य
के पुरोधा इसी सादे जीवन में महान रचनाएं लिखकर अमर हो गए लेकिन अब साहित्य सृजन
के साथ-साथ अपने लुक और नई टेक्नोलॉजी के प्रयोग करने के लिए भी तत्पर है आधुनिक
लेखक. वे न सिर्फ नए-नए विषयों पर लिख रहे हैं बल्कि अपनी रचनाओं की मार्केटिंग के
लिए नए युग की रणनीतियों को भी अपना रहे हैं. इसके साथ ही वे अपनी छोटी बड़ी
गतिविधियों को तत्काल सोशल मीडिया पर अपडेट भी करते हैं.
सादगी थी पहचान :
मुंशी प्रेमचन्द ने अपनीलेखनी के दम पर पूरे विश्व में पहचान बनाई
लेकिन साधारण कद-काठी के इस कालजयी
उपन्यासकार की पहचान धोती-कुर्ता और सादगी ह बनी रही. तबसे लेकर कुछ समय पहले तक
लेखक सादे जीवन का पर्याय होते थे लेकिन आज के लेखक इस सेट पैटर्न से निकल रहे
हैं. वे अपनी लेखनी को लेकर हर नजर से देखते और हर कोण से सोचते हैं. नए लेखकों का
कार्पोरेट और मार्केटिंग की दुनिया से जुड़ा होना उन्हें पेशेवर बनाता है और वे नए
तरीकों से अपनी किताबों को प्रमोट भी कर रहे हैं.
बस लेखन पर रखें नजर :
किसी के कपड़ों से उसके व्यक्तित्व और प्रोफेशन की पहचान होती थी,
जिसमें लेखकों की भी एक खास वेशभूषा होती थी. पर अब लेखक इस सीमारेखा से बाहर आ
चुके हैं.महिला मुद्दों पर खरा-खरा लिखने वाली लेखक और पब्लिशर का कहना है कि मैं
तो बचपन से ही कोट-पैंट या जैकेट पहनती हूँ. जिन्स में कम्फर्ट महसूस करती हूँ. कई
बार लोग कहते हैं कि हिन्दी किताब का विमोचन है और आप वेस्टर्न ड्रेस में. इस पर
मैं कहती हूँ कि जो मेरे अंदाज है उसे बाहर से मत परखिए. यह मेरा कंफर्ट है और जो
किताब लिखी है, जैसा विषय चुना है, वह भी मेरा कंफर्ट है. आप उसे है, जैसा विषय
चुना है, वह भी मेरा कंफर्ट है. आप उसे ही देखिए.
ईमानदरी बनाती है कामयाब :
आज लेखक की शोसल मीडिया से अच्छी खासी यारी है. वे अपने किताबों को
यहाँ बखूबी प्रमोट भी करते हैं और अपने प्रशंसकों से जुड़ाव भी बनाए रखते हैं लेकिन
सोशल मीडिया पर ईमानदारी बने रहना इनके हक़ में जाता है. लेखक दिव्य प्रकाश दुबे भी
इससे इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं, ‘सोशल मीडिया पर ईमानदारी से पेश आएं
क्योंकि उनका कोई बैकग्राउंड नहीं होता और लोग उनकी ईमानदारी देखकर ही किताब
खरीदते हैं. मेरे मामले में इस चीज ने काफी काम किया.’
अब वो बंद कमरा कहाँ :
इतिहास में नाम दर्ज करा चुके देश-विदेश के साहित्यकार किसी विशेष आदत
और स्थिति के बीच ही लेखनकर्ता जहाँ जैसा माहौल मिले, अपने लैपटॉप पर लिखते रहते
हैं. यहाँ तक कि ट्रेवलिंग के दौरान भी लेखन कार्य रुकता नहीं. एक लेखिका श्रुति
अग्रवाल कहती है, ‘पहले कहते थे कि लेखक वे होते हैं जो बन्द कमरे में लिखते हैं.
अब लेखक बदल गए हैं. उनके लेखन का माहौल बदला है. अब तो ऐसे लेखक भी हैं, जो उम्र
में छोटे हैं लेकिन पूरी दुनिया घूम चुके हैं और उनके अनुभवों पर किताबें भी आ
चुकी हैं.’

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