हिन्दी भाषा साहित्य के नाट्य जीवन है रंगमंच
नाट्य का जीवन है रंगमंच
![]() |
| हिन्दी नाटक और रंग मंच |
काव्य शास्त्र के नौ रसों में शान्त रस को छोड़कर
सभी का समावेश नाटक में होता है. अभिनय नाटक की विशेषता है, तो रंगमंच नाटक की
कथावस्तु, शिल्प और भाव-भंगिमा को प्रस्तुत करने का मंच है. नाटक जब किसी मंच पर
प्रस्तुत होगा तभी वह जिवंत होगा. नाटक और रंगमंच को लेकर जयशंकर प्रसाद का मंतव्य
है, “नाटककार यदि अपने अनुकूल रंगमंच की मांग करता है तो उसके ऊपर यह फतवा देना
ठीक नहीं कि उसे रंगमंच का आदिकर्ता होता है.” हिन्दी में नाट्य साहित्य की शुरुआत
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से मानी जाती है तो हिन्दी साहित्य में अध्ययन सुविधा को
दृष्टि गत रखते हुए हिन्दी नाट्यकला के विकास को चार काल खण्डों में बांटा गया है,
जिनमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद और
प्रसादोत्तर युगीन नाटक (1937 से अब तक) भारतेन्दु रचित नाटकों के सन्दर्भ में
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं, ‘नाटकों की रचना में उन्होंने मध्यम मार्ग का
आलंबन किया. न तो बांग्ला की नाटकों की तरह प्राचीन भारतीय शैली को एक बार की होड़
पर अंग्रेजी नाटकों की नकल पर चले और न प्राचीन नाट्य शास्त्री की जटिलता में अपने
को फंसाया.’
भरत मुनि रचित ग्रन्थ ‘नाट्यशास्त्र’ में नाटक
में मूल तत्वों की व्याख्या की गई तो महवीर प्रसाद द्विवेदी रचित निबन्ध ‘नाट्यशास्त्र’
में इनकी गहराई से पड़ताल की गई. हिन्दी नाटक लिखने वालों के सन्दर्भ में द्विवेदी
जी का कथन है, ‘नाटक लिखने के लिए विद्दा-बुद्धि के अतिरिक्त लोक व्यवहार और
मनुष्य प्रकृति का पूरा ज्ञान होना चाहिए. नाटक से कोई न कोई शिक्षा अवश्य मिलनी
चाहिए. ऐसा न हुआ तो नाटककार का प्रयत्न, अभिनेता का परिश्रम व्यर्थ और दर्शकों का
नेत्र व्यापार भी व्यर्थ है.
महावरी प्रसाद द्विवेदी के समय में नाटकों में
नैतिकता की बातें चरम पर थीं और कलात्मक विकास की गति मंद रही. जयशंकर प्रसाद युग
में नाट्य लेखन में मौलिक क्रान्ति आई तो प्रसादोत्तर युगीन नाटकों में यथार्थ का
प्रभाव अधिक रहा. रंगमंच पर होने वाले नाटकों में पुनरुत्थान और पुनर्जागरण का दौर
चला जो आज भी जारी है.
छोटी अमित छाप :
नई कहानी आन्दोलन के शीर्ष कथाकार मोहन
राकेश ने नाट्य लेखन को नए दौर से जोड़ा, तो उपन्यासकार के तौर पर अमिट पहचान बनाई.
मोहन राकेश ने अपनी कहानियों में मध्यम वर्ग के साथ ही भारत विभाजन का मार्मिक
चित्रण भी किया है. भारत के विभाजन को करीब से देखने वाले मोहन राकेश की कहानी ‘परमात्मा
का कुत्ता’ में स्वतंत्रता के बाद नौकरशाही की कार्यशैली का जीवंत चित्रण मिलता
है. आधुनिक हिन्दी नाटक की विकास यात्रा के वाहक मोहन राकेश ने नाटक और रंगमंच को
एक-दूसरे से जोड़ने का कार्य भी किया है. स्वाधीनता के बाद सांस्कृतिक पुनर्जागरण
के दौर में मोहन राकेश के नाट्य लेखन ने रंगमंच की दिशा ही बदल दी. नाटक सिर्फ
मनोरंजन का साधन न होकर साध्य कला का माध्यम बन गया. 3 जनवरी 1972 को दिवंगत हुए
मोहन राकेश कुछ तक सारिका के संपादक भी रहे.

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें