मौलिक चिन्तन के लेखक पंडित बालकृष्ण भट्ट

हिन्दी भाषा साहित्य के मौलिक चिन्तन के लेखक पंडित बालकृष्ण भट्ट

मौलिक चिन्तन के लेखक पंडित बालकृष्ण भट्ट, pandit balkrishn bhatt

पंडित बालकृष्ण भट्ट

सर्जनात्मक लेखन से राष्ट्रव्यापी सोच को प्रमुखता देने वाले पं. बालकृष्ण भट्ट की जन्मतिथि पर वेशेष :


आधुनिक हिन्दी गद्द साहित्य के निर्माण और विकास में भरतेंदु युग के साहित्यकार पंडित बालकृष्ण भट्ट का नाम उल्लेखनीय है. ‘हिन्दी प्रदीप’ मासिक पत्रिका के माध्यम से वह करीब 32 वर्ष तक हिन्दी साहित्य की सेवा करते रहें. 
3 जून 1844 क प्रयाग में जन्मे बाल कृष्ण भट्ट प्रखर निबन्धकार और नाटककार थे. प्रयाग के कायस्थ पाठशाला में वह संस्कृत के अध्यापक रहे. हास्य व्यंग प्रियता, सहज भाव अभिव्यक्ति और सक्षम भाषा के कारण हिन्दी गद्द साहित्य में अपना श्रेष्ठ स्थान रखने वाले बालकृष्ण भट्ट ने लेखन की सभी शैलियों से साहित्य को समृद्ध किया. 
‘हिन्दी साहित्य के इतिहास’ में बालकृष्ण भट्ट के बारे में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि ‘समय के प्रतिकूल मूल विचारों को उखाड़ने और परिस्थिति के अनुकूल नए विचारों को जमाने में उनकी लेखनी सदा तत्पर रहती थी.’ आचार्य शक्ल के अनुसार पंडित बाल कृष्ण भट्ट ने हिन्दी गद्द साहित्य में वही काम किया है, जो अंग्रेजी गद्द साहित्य में एडिसन और स्टील ने किया था. ‘साहित्य सुमन’, ‘भट्ट निबन्धावली’ विभिन्न विषयों पर उनके लिखे निबंधों के संग्रह है. ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘राजा’ निबन्धों में तीक्ष्ण व्यंग शब्दों का समावेश है. निबंधों के अतिरिक्त भट्ट जी ने कई नाटक भी लिखे. इनमें ‘कलिराज की सभा’,रेल का विकट खेल’, ‘बालविवाह’, चंद्रसेन’ प्रमुख हैं. दुलर्भ उपन्यासों की श्रेणी में आने वाला ‘नूतन ब्रह्चारी’ और ‘सौ अजान एक सुजान’ लिखने वाले बाल कृष्ण भट्ट जी को पंडित बरदरी नारायाण के साथ ही सम्यक समालोचना का हिन्दी में सूत्रपात करने का श्रेय भी मिलता है

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