आदिकाल आदिकाल के नामकरण II aadikal ka naamkaran II aadikal ki pravritiyan II aadikal ke kavi
आदिकाल आदिकाल के नामकरण II aadikal ka naamkaran II aadikal ki pravritiyan II aadikal ke kavi
हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक काल का प्रारंभ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने संवत 1050 से माना है जिसके विपरीत महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी और डॉ. रामकुमार वर्मा सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही इस काल का प्रारंभ मानते हैं. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी शुक्ल जी के ही काल सन् 1000 ई. से इस काल का प्रारंभ माना है. इस काल के आदिकाल के नामकरण का प्रश्न भी विवादास्पद है. आदिकाल का काल विभाजन और नामकरण के विषय में शुक्ल जी ने इसे ‘वीरगाथा काल’ कहा. राहुल जी इसे ‘सिद्धसामंत युग’ कहने के पक्षधर हैं और और डॉ. रामकुमार वर्मा ने इसे ‘चारण काल’ कहते हैं. वस्तुत: इस काल में विविध काव्यगत प्रवृत्तियों का उन्मेष हुआ और भाषा (aadikal ki bhasha) का भी संक्रमण-काल होने के कारण भाषागत विविध रूप से इस काल की रचनाओं में मिलते हैं कि काव्य प्रवृत्ति के आधार पर अथवा किसी भाषा-प्रवृत्ति के आधार पर इस काल का नामकरण दोषपूर्ण एवं सीमित हो जाता है. इन्हीं परिस्थितियों aadikal ki paristhiti (आदिकाल की प्रमुख परिस्थितियां) का सम्यक विचार करने के बाद डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस काल को ‘आदिकाल’ कहना ही सबसे उपयुक्त माना. ‘वीरगाथा काल’ नाम केवल रासो संज्ञक रचनाओं पर आधारित था और उनमें से ‘पृथ्वीराज रासो’ को ही उस अर्थ में वीरगाथा कहा जा सकता है जिस अर्थ में शुक्लजी ने इसका प्रयोग किया है. इस धारा की दूसरी प्रमुख रचना ‘बीसलदेव रासो’ श्रृंगार की रचना है, इसमें कोई वीरगाथा नहीं है. इसी प्रकार सिद्ध काव्य, जैन काव्य, नाथ काव्य में बहुत-सा पुरानी हिन्दी का साहित्य है जो इस नाम की परिधि से बाहर जो जाता है. adikal ke kavi जो स्फुट कवियों में अमीर खुसरो, विद्दापति, मुल्लादाऊद भी इस नामकरण के अपवाद ही होंगे.
हिन्दी साहित्य के ‘आदिकाल’ में हम अपभ्रंश की जिन धाराओं का
अध्ययन करते हैं, उनका व्यावहारिक दृष्टिकोण ही स्वीकार्य हो सकता है कि इन धाराओं का परवर्ती हिन्दी साहित्य पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है. अत: पृष्ठभूमि के रूप में इनका अध्ययन उपयोगी है. पर अपभ्रंश और हिन्दी अलग-अलग भाषाएँ हैं.
आदिकाल की प्रमुख धाराएं में विभक्त किया जा सकता है –
1. अपभ्रंश काव्य
क. सिद्ध काव्यधारा
ख. जैन काव्यधारा
2. भाषा काव्य
क. नाथ काव्यधारा
ख. रासो काव्यधारा
ग. स्फुट काव्य
इन समस्त धाराओं की कुछ आदिकाल की प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ) aadikal ki pravritiyan लक्षित की जा सकती हैं-
1. इस काल के अधिकाँश कवि किसी न किसी धार्मिक पंथ से संबंधित है. काव्य ही उनका अभिप्रेत नहीं है, अपितु काव्य तो उनके लिए साधन मात्र है. उनका मूल लक्ष्य तो परमात्मा और जगत् का चिन्तन है. अत: वे जगत् से विरक्त हैं और उनका काव्य भी रहस्यानुभूतिमूलक है. रासो काव्य-धारा और स्फुट काव्य इसके अपवाद हैं.
2. इस काल में भक्तिकाल की विभिन्न धाराओं का बीज-वपन हुआ. सिद्धों-नाथों से संतकाव्य, जैन प्रेमाख्यानों-रासो प्रबन्धों से सूफी काव्य, विद्दापति पदावली से कृष्णकाव्य और सूरजदास के ‘रामजन्म’ से रामकाव्य का सूत्र अग्रसर हुआ.
3. इस काल में कवि काव्यानुभूति को दर्शन की पराभूमि पर प्रतिष्ठित करके उसे एक दिव्य धरातल प्रदान करते हुए दीख पड़ते हैं.
4. इस काल में कवि परमात्मा के चिन्तन के साथ-साथ समाज-जीवन का भी चिन्तन करते हैं. समाज की रूढ़ियों, अंधविश्वासों और असमानता-छुआछूत आदि पर तीखा प्रहार करते हैं.
5. इस काल की धार्मिक प्रवृत्तियों में अहिंसा, सत्य, परोपकार, समता आदि की प्रतिष्ठित द्वारा एक नवीन मानवतावादी मूल्य की प्रतिष्ठा हुई.
6. इस काल की भाषा अपभ्रंश का वह अंतिम रूप है, जिसे पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने ‘पुरानी हिन्दी’ कहा है. इस भाषा में अपभ्रंश भाषा का अपभ्रंशपन टूट रहा था और हिंदीपन का प्रारंभ हो रहा था. इसी कारण इस काल की हिन्दी में अपभ्रंशाभास होने की प्रवृत्ति लक्षित की गयी है. पर सिद्ध, जैन और इनसे इतर 1000 ई. पूर्व की रचनाएँ अपभ्रंश भाषा की रचनाएँ हैं जो एक स्वतंत्र भाषा है और उसे हिन्दी नहीं कहा जा सकता. लौकिक साहित्य की भाषा राजस्थानी और अपभ्रंश प्रभावित ब्रजभाषा थी.
7. इस काल के कवियों ने रूढ़ियों और अंधविश्वासों का विरोध करते हुए एक नवीन तर्कसम्मत सामाजिक व्यवस्था का प्रतिपादन किया जिसमें मानव मूल्य की स्थापना का एक सहज प्रयास दीख पड़ता है.
8. सामजिक जीवन में छुआछूट और जातिगत ऊँच-नीच की भावना एवं जातीय संकीर्णता का विरोध भी कवियों की वाणी में मुखरित होता हुआ दीख पड़ता है.
9. लौकिक साहित्य (वीरगाथा काव्य) मैं लोक जिव का सजीव चित्रण, युद्ध और श्रृंगार का वर्णन और प्रकृति का परम्परित वर्णन प्रचलित काव्य-शैली में मिलता है.
10. इस काल के लौकिक साहित्य में मुख्य रस वीर और श्रृंगार थे और इनमें भी श्रृंगार की प्रधानता थी.
लौकिक साहित्य प्रबन्ध काव्य के रूप में लिखा गया जिनका काव्य रूप अपभ्रंश काव्यों की शैली पर हुआ था.
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