चित्रा मुद्गल, वरिष्ठ कथाकार II प्रकृति के साथ साहित्य सृजन
प्रकृति के साथ साहित्य सृजन
कोरोना काल में रचनात्मकता के साथ साहित्यकार ने किस तरह से अपने समय
का उपयोग किया है, जानते हैं उन्हीं से ....
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चित्रा मुद्गल |
चित्रा मुद्गल, वरिष्ठ कथाकार
गाड़ी पटरी पर आ रही है. जान है तो जहान है, जहान के साथ जीने की
सुविधाएँ हैं. स्वअनुशासन का पालन कर हम अभी भी भयानक स्थितियों से बचे हुए हैं.
सामाजिकता से कटकर कितने दिनों तक रहा जा सकता है. सामाजिकता जीवन का स्पंदन है.
चाहे मनुष्यता कितनी भी ऊपर उठी हो, हमें प्रकृति को भूलना नहीं चाहिए.
जनता कर्फ्यू के दौरान मैंने 34 पेटिंग्स बनाई थीं. ये मेरे लिए
ऐतिहासिक दिन बन गए. बीते दिनों में मैंने मन की अनेक भावनाएं लिखकर पूरी की हैं.
जो कुछ भी अपने गुरुओं मृणाल ताई गोरे, अनंतराम त्रिपाठी जी से सीखा है, जिन
सृजकों से सीखा, उन्हें कलमबद्ध किया है. ऐसा महसूस होता है कि कोरोना काल में
उपजी भयजन्य मानसिकता से यदि कोई मोर्चा ले सकता है तो वह है साहित्य. जो शक्ति
मनुष्यों में खो गई, उसे साहित्य सृजन ही उपस्थित करेगा.
पुराना साहित्य फिर से पढ़ा. जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ से बड़ा कोई काव्य नहीं
है. अब मैंने समझा उस विमर्श को. उनका ‘कंकाल’ दोबारा पढ़ा. उनका नाटक ‘ध्रुव
स्वामिनी’ और मोहन राकेश का उपन्यास ‘अँधेरे बंद कमरे’ पढ़ा साथ ही उड़िया के
प्रेमचंद फ़क़ीर मोहन सेनापति की कहानियों को पढ़ा. उन्होंने काफी कम कहानियाँ लिखीं.
एक नया उपन्यास लिख रही हूँ, जो पूरा होने को है. नाम है ‘नकतौरा, यह एक
एक्सपेरिमेंटल उपन्यास है. बैसवारा में कहते हैं कि जब बारात दुल्हन को लेने जाती
है तो घर की महिलाएँ रात में पुरुषों की नकल करती हैं, गालियाँ देती हैं, गाती
हैं. आज मुझे लगता है कि पूरा समाज, राजनीति सब नकतौरा के दौर में है. इस वर्ष
मेरी तीन किताबें आईं, जिनमें मेरे प्रेमी पति और सारिका के संपादक रहे अवध नारायण
मुद्गल पर संस्मरण ‘तिल भर जगह नहीं’. स्त्री विमर्श पर कई लेखों का संकलन
‘छिन्नमस्ता नहीं हूँ, और ‘चित्रा मुद्गल संचयन’.

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