संत काव्यधारा II sant kavya dhara ke kavi


संत काव्यधारा (sant kavy dhara)

sant kavi in hindi
संत काव्यधारा

संत काव्यधारा : उत्तरी भारत में सातवीं शताब्दी से ही सहज यानी सिद्धों का व्यापक प्रभाव दीख पड़ता है. उनकी ही सधाना और काव्य की परंपरा में नाथपंथी योगियों का सिलसिला शुरू होता है. त्वात्विक दृष्टि से सिद्धों का संबंध बौद्ध-दर्शन से और नाथ-योगियों का शैव-दर्शन से है. पर योग साधना दोनों में ही थी और दोनों का आधार पतंजलि का योग दर्शन था. साधना और सिद्धों की दृष्टि में सिद्धों और योगियों में कुछ अंतर होते हुए भी वे साधना की मूल दृष्टी और पारिभाषिक शब्दावली में बहुत कुछ समान थे. (sant kavya dhara ke kavi) साथ ही इनदोनों ने ही आतंरिक साधना के साथ ही साथ समाज में व्याप्त छुआछूत और जातिभेद आदि का तिरस्कार किया और पूजा-अर्चा के रुढ़िग्रस्त पाखंडों का डटकर विरोध किया. काया-शोधन और अन्तस् की ज्योति जगाकर ब्रह्म की आत्मानुभूति का प्रतिपादन करते हुए वे मानवमात्र के लिए एक सामान्य मार्ग की भूमिका बना रहे थे. (संत काव्य धारा के कवि) इसी मार्ग को लोक में प्रतिष्ठित करने का कार्य संतो द्वारा हुआ.
नवीं

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